च्यवनप्राश की खोज के पीछे है राजकुमारी के त्याग की कहानी
- आज भी श्री कामदगिरि के पाचवें आवरण में तपस्यारत हैं
- चित्रकूट के जंगलों व पहाड़ों में औषधियों की है बहुलता
कहते हैं कि एक औरत आदमी की जिंदगी को बदल देती है और ऐसी ही कहानी च्यवनप्राश की खोज की है। एक राजकुमारी की जिद ने च्यवनप्राश की खोज एक ऋषि से करवा डाली। च्यवनप्राश यानि एक ऐसी औषधि जो मनुष्य के सर्वांग शरीर का कायाकल्प कर वृद्व शरीर को जवान बना दे। ऋषि ने जब इस अवलेह को तैयार कर उसका प्रयोग किया तो उस औषधि का नाम ही उनके नाम पर च्यवनप्राश पड़ गया। वैसे तो इस घटना का उल्लेख आयुर्वेद की पुस्तकों में किया गया है लेकिन इसका सबसे बड़ा प्रमाण ऋग्वेद में है, और कथानुसार जब राजकुमारी तप करते सैकड़ों वर्ष से तपस्यारत ऋषि की आंखों को फोड़ देती है और सच्चाई जानने के बाद वह पश्चाताप से अपने आपको ऋषि सेवा में समर्पित करने की प्रण लेती है तो द्रवित होकर ऋषि उस राजकुमारी के लिए इस तरह का अनोखा प्रयोग कर डालते हैं। कहने को तो इस घटना का उल्लेख देश के कई अन्य स्थानों पर बताया जाता है, पर तमाम जड़ीबूटियों की बहुलता के साथ ही और चरक जैसे आयुर्वेद के महान ऋषियों आचार्यों की यहां पर उपस्थिति के कारण यह अनुमान कई इतिहासकारों ने लगाया कि यहां पर ऋषि चयवन ने निवास किया। वैसे महर्षि वाल्मीकि द्वारा लिखी रामायणम के चित्रकूट पर्व पर श्री कामदगिरि के पांचवें आवरण में तपस्यारत ऋषियों की श्रंखला में ऋषि चयवन का नाम आना इस बात का साफ प्रमाण है कि आज भी ऋषि चयवन यहां पर मौजूद हैं।
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वैसे तो आयुनिक युग में तमाम खोजों पर उसके अविष्कारकों का नाम दिखाई देता है, पर हमारे एक प्राचीन ऋषि की जड़ी बूटियों के मिश्रण के एक अवलेह से उनका नाम जोड़ दिया गया और इस अवलेह का नाम च्यवनप्राश ही पड़ गया। सदियों बाद भी च्यवनप्राश का उपयोग देश ही नही बल्कि विदेश की तमाम नामी गिरामी कंपनियां अपने अपने अनुसार व्याख्या कर उत्पादन करती हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि आज भी कंपनियों ने इस अवलेह का नाम च्यवनप्राश ही रखा है। च्यवन ऋषि ने ही जड़ी-बुटियों से च्यवनप्राश नामक एक औषधि बनाकर उसका सेवन करके वृद्धावस्था से पुनः युवा बन गए थे। महाभारत के अनुसार, उनमें इतनी शक्ति थी कि वे इन्द्र के वज्र को भी पीछे धकेल सकते थे। च्यवन ऋषि महान् भृगु ऋषि के पुत्र थे। इनकी माता का नाम पुलोमा था। इनकी ख्याती आयुर्वेदाचार्य और ज्योतिषाचार्य के रूप में है। ग्रंथ का नाम च्यवनस्मृति और जीवदान तंत्र है। यहां प्रस्तुत है उनके बारे में संक्षिप्त और कुछ अलग हटकर जानकारी।
महर्षि भृगु के भी दो विवाह हुए। इनकी पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या थी। दूसरी पत्नी दानवराज पुलोम की पुत्री पौलमी थी। पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या देवी से भृगु मुनि के दो पुत्र हुए जिनके नाम शुक्र और त्वष्टा रखे गए। आचार्य बनने के बाद शुक्र को शुक्राचार्य के नाम से और त्वष्टा को शिल्पकार बनने के बाद विश्वकर्मा के नाम से जाना गया। इन्हीं भृगु मुनि के पुत्रों को उनके मातृवंश अर्थात दैत्यकुल में शुक्र को काव्य एवं त्वष्टा को मय के नाम से जाना गया है।
दूसरी पत्नी पौलमी असुरों के पुलोम वंश की कन्या थी। पुलोम की कन्या की सगाई पहले अपने ही वंश के एक पुरुष से, जिसका नाम महाभारत शांतिपर्व अध्याय 13 के अनुसार दंस था, से हुई थी। परंतु उसके पिता ने यह संबंध छोड़कर उसका विवाह महर्षि भृगु से कर दिया। जब महर्षि च्यवन उसके गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में एक दिन अवसर पाकर दंस (पुलोमासर) पौलमी का हरण करके ले गया। शोक और दुख के कारण पौलमी का गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह च्यवन (गिरा हुआ) कहलाया। इस घटना से दंस पौलमी को छोड़कर चला गया, तत्पश्चात पौलमी दुख से रोती हुई शिशु (च्यवन) को गोद में उठाकर पुनरू आश्रम को लौटी। पौलमी के गर्भ से 5 और पुत्र बताए गए हैं।
च्यवन का विवाह मुनिवर ने गुजरात के भड़ौंच (खम्भात की खाड़ी) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से किया। भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिण में पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ-भृगु क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा।
सुकन्या से च्यवन को अप्नुवान नाम का पुत्र मिला। दधीजच इन्हीं के भाई थे। इनका दूसरा नाम आत्मवान भी था। इनकी पत्नी नाहुषी से और्व का जन्म हुआ। और्व कुल का वर्णन ग्रंथों में ऋग्वेद में 8-10-2-4 पर, तैत्तरेय संहिता 7-1-8-1, पंच ब्राह्मण 21-10-6, विष्णुधर्म 1-32 तथा महाभारत अनु. 56 आदि में प्राप्त है।
अब जानिये सम्पूर्ण कथा
भारत में राजा शर्याति का शासन था। वे अत्यंत न्यायप्रिय, प्रजासेवक एवं कुशल प्रशासक थे। सद्गुणों का व्यापक प्रभाव राजा के पुत्रों पर भी पड़ा। उनके पुत्र और पुत्रियां अपने पिता के पदचिह्नों पर ही चल रहे थे। राजा शर्याति अपने पुत्रों को देखकर स्वयं प्रसन्न रहा करते थे।
एक दिन राजा शर्याति अपने पुत्र-पुत्रियों के साथ वन विहार के लिए निकले। राजा-रानी तो एक सरोवर के निकट विश्राम के लिए बैठ गए लेकिन उनके पुत्र-पुत्रियां परस्पर घूमते-टहलते दूर जा निकले।
असमय ही राजकुमारी सुकन्या ने मिट्टी के टीले में दो चमकदार मणियां देखीं। कुतूहलवश सुकन्या उस मणि के निकट आई। नजदीक देखने पर भी वह चमकती वस्तु को समझ न पाई। तब उसने सूखी लकड़ी की सहायता से दोनों चमकदार मणियों को निकालने का यत्न किया लेकिन मणि निकली नहीं, अपितु वहां से खून बहने लगा।
मणि से खून टपकते देख सुकन्या और उसके भाई-बहन घबरा गए। वे सभी अपने पिता के पास आए और पूरी बात कह सुनाई।
महाराजा शर्याति अपनी पत्नी के साथ उस स्थान पर पहुंचे और देखते हुए दुखी मन से बोले- बेटी! तुमने बड़ा पाप कर डाला। यह च्यवन ऋषि हैं जिनकी तुमने आंख फोड़ दी है।
यह सुनते ही सुकन्या रो पड़ी। उसका शरीर कांपने लगा। टूटते हुए स्वर में उसने कहा- श्मेरी जानकारी में नहीं था कि यह महर्षि बैठे हुए हैं। मैंने बड़ा अनर्थ कर डाला। यह कहकर वह फिर से फूट-फूटकर रो पड़ी। पुत्री तुमसे अपराध हो गया है। महर्षि च्यवन यहां पर तपस्या कर रहे थे। आंधी-तूफान और वर्षा के कारण इनके चारों तरफ मिट्टी का टीला बन गया है। इसी कारण तुम्हारी दृष्टि को दोष हो गया। मात्र दो आंखें चमकती हुई दिखाई दीं। अब क्या होगा? इतने में च्यवन ऋषि के कराहने का स्वर भी सुनाई दिया। कातर स्वर सुनकर सुकन्या ने तय किया- मैं इस पाप का प्रायश्चित करके इस हानि की क्षतिपूर्ति करूंगी। तुम्हारे प्रायश्चित से ऋषि की आंखें तो वापस नहीं आएंगी। पिता राजा शर्याति ने कहा। सुकन्या बोली- मैं इनकी आंखें बनूंगी। क्या कह रही हो बेटी?
मैं उचित कह रही हूं पिताजी। मैं ऋषिदेव की आंख ही बनूंगी। मैं मात्र भूल व क्षमा का बहाना बनाकर अपराध मुक्त नहीं होना चाहती। न्याय-नीति के समान अधिकार को स्वीकार कर चलने में ही मेरा व विश्व का कल्याण है, मैंने यही सब तो सीखा है। मैं च्यवन ऋषि से विवाह करूंगी और अपने जीवनपर्यंत उनकी आंख बनकर सेवा करूंगी। लेकिन बेटी! यह तो अत्यंत जर्जर व कृशकाय शरीर के हैं और तू युवा। राजा शर्याति ने कहा।
सुकन्या बोली- पूज्य पिताजी! यहां पात्रता और योग्यता का प्रश्न नहीं है। मुझे तो सहर्ष प्रायश्चित करना है। मैं इस कार्य को धर्म समझकर तपस्या के माध्यम से आनंदपूर्वक पूर्ण करके रहूंगी। मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करें। बेटी सुकन्या की जिद के समक्ष राजा शर्याति की एक न चली। वे विवश थे अतएव विवाह की तैयारी में जुट गए। महर्षि च्यवन के साथ बेटी सुकन्या का पाणिग्रहण हुआ। सुकन्या की इस अद्भुत त्याग भावना को देखकर देवगण भी अत्यंत प्रसन्न हुए। सुकन्या की कम आयु को देखकर देवताओं ने च्यवन ऋषि को एक औषधि बताई, जिसे च्यवन ऋषि ने उपभोग किया और वे युवा हो गए। उस औषधि का नाम बाद में च्यवन हुआ जिसे आज लोग शक्ति, चेतना व स्वास्थ्य लाभ के लिए ग्रहण करते हैं। प्रायश्चित व सेवाभावना के कारण सुकन्या का नाम च्यवन ऋषि ने श्मंगलाश् रख दिया। वह आज भी अपने गुणों के कारण नारी-जगत में वंदनीय व पूजनीय है।
ऋषि चयवन और अश्विनी कुमार
सुकन्या बहुत पतिव्रता थी वह च्यवन ऋषि की सेवा दिन रात लगी रहती. एक दिन च्यवन ऋषि के आश्रम में , देवों के वैद्य अश्विनीकुमार आ जाते हैं। सुकन्या उचित प्रकार से उनका आदर-सत्कार एवं पूजन करती है। उसके इस आदर भाव व पतिव्रत से से प्रसन्न अश्विनीकुमार उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं। वह च्यवन ऋषि को उनका यौवन व आंखों की ज्योती प्रदान करते हैं। आँखों की ज्योती और नव यौवन पाकर च्यवन मुनि बहुत प्रसन्न होते हैं। वह अश्चिनीकुमारों को सोमपान का अधिकार दिलवाने का वचन देते हैं।
यह सुनकर अश्विनी कुमार प्रसन्न होकर और उन दोनों को आशीर्वाद देकर वहाँ से चले जाते हैं। शर्याति जब च्यवन ऋषि के युवा हो जाने के बारे में सुनते हैं तो बहुत प्रसन्न होते हैं व उनसे मिलने जाते हैं। ऋषि च्यवन, राजा से कहकर एक यज्ञ का आयोजन कराते हैं। जहां वह यज्ञ का कुछ भाग अश्विनी कुमारों को प्रदान करते हैं। तब देवराज इन्द्र आपत्ति जताते हैं और अश्वनी कुमारों को यज्ञ का भाग देने से मना करते हैं। परंतु च्यवन ऋषि, इन्द्र की बातों को अनसुना कर देते हैं इससे क्रोधित होकर इन्द्र ने उन पर वज्र का प्रहार करने लगते हैं। किंतु ऋषि च्यवन अपने तपोबल से वज्र को रोककर एक भयानक राक्षस उत्पन्न करते हैं। वह राक्षस इन्द्र को मारने के लिए दौडता ह। इन्द्र ने भयभीत होकर अश्व्नीकुमारों को यज्ञ का भाग देना स्वीकार कर लेते हैं। च्यवन ऋषि से क्षमा मांगते हैं। च्यवन ऋषि का क्रोध शांत होता है और वह उस राक्षस को भस्म करके इन्द्र को कष्ट से मुक्ति प्रदान करते हैं।
ऋषि च्यवन और कुशिक
एक बार च्यवन मुनि ने कुशिक वंश को पूर्ण रुप से समाप्त करना चाहा, इसलिए वह राजा कुशिक के यहाँ अतिथि रूप में जाते हैं और इक्कीस दिनों तक उनकी कडी परीक्षा लेते हैं लगे. राजा-रानी उनकी सेवा में लग गये। इस प्रकार के अनेक कृत्य होने पर भी जब राजा कुशिक तथा रानी अपने कर्म से विचलित नही हुए तो च्यवन उनके सेवाभाव से बहुत प्रसन्न होते हैं और उन्हें एक अद्भुत स्वर्णमहल प्रदान करते हैं तथा वरदान स्वरूप उन्हें महापराक्रमी क्षत्रिय धर्मा वंशज(परशुराम) के उत्पन्न होने का वर देते हैं तथा वह कहते हैं की राजा कुशिक की तीसरी पीढ़ी से कौशिक वंश प्रारंभ होगा और तुम्हारे वंश गाधि को विश्वामित्र नामक ब्राह्मण-पुत्र की प्राप्ति होगी जो ब्राह्मण क पद प्राप्त करेगा. इतना कहकर ऋषि ने उन दोनों से विदा लेते हैं.
ऋषि च्यवन द्वारा रचित ग्रंथ
च्यवन ऋषि द्वारा अनेक ग्रंथों की रचना हुई. उनके द्वारा रचित च्यवन स्मृति में उन्होंने विभिन्न तथ्यों के महत्व को दर्शाया. इसमें उन्होंने गोदान के महत्व के विषय में लिखा इसके साथ ही बुरे कार्यों से बचने का मार्ग एवं प्रायश्चित का विधान भी बताया. भास्कर संहिता में इन्होंने सूर्य उपासना और दिव्य चिकित्सा से युक्त जीवदान तंत्र भी रचा है जो एक महत्वपूर्ण मंत्र है. अनेक महान राजाओं ने इनके निर्णयों को अपने धर्म कर्म में शामिल किया।
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चित्रकूट क्षेत्र में औषधियों की बहुलता है, यहां पर कुछ ऐसी दिव्य औषधियां मिलती हैं जो देश विदेश में कहीं अन्य स्थानों पर नही मिलती है। चित्रकूट में प्राचीन ऋषियों की एक बड़ी श्रंखला है इसलिए यहां पर ऐसी खोजें होना सामान्य बात है, हमें गर्व है कि हमारे ऋषियों ने ऐसी खोजें कर मानवता को एक बड़ा उपहार दिया है।
डा0 सीताराम गुप्ता, वरिष्ठ चिकित्सक चित्रकूट
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च्यवनप्राश कई जड़ी बूटियों के संगम से तैयार होने वाली अमूल्य औषधि है। यह मानव शरीर का सम्पूर्ण कायाकल्प कर देता है।
परिपक्व आंवला, शंखपुष्पी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, सफेद मूसली, पलाश, भूमि आंवला, खैर के बीज, गाद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस, ब्राह्मी, चंदन, गुग्गल, पत्थरचुर, पिप्पली, दारुहल्दी, इसबगोल, जटामांसी, चिरायता, कालमेघ, कोकुम, कथ, कुटकी, मुलेठी, केसर, सर्पगंधा, शतावरी, तुलसी, वत्सनाम, मकोय आदि जड़ी बूटियों के मिश्रण को एक निश्चित मात्रा में डालकर तैयार किया जाता है।
चित्रकूट में बहुतायत में जड़ी- बूटियां पाई जाती हैं। आयुर्वेद का आधार इन्हीं जड़ी- बूटियों में निहित है। च्यवनप्राश चित्रकूट परिक्षेत्र में तैयार हुआ, इसके प्रमाण तो नहीं हैं। लेकिन, च्यवन ऋषि के मडफा में निवास के प्रमाण कुछ ग्रंथों में मिलने के कारण माना जा सकता है कि इसका निर्माण यहीं पर हुआ।
वैद्य डाक्टर मदन गोपाल बाजपेई, आरोग्य सदन चित्रकूट



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