अग्नि के अविष्कारक ऋषि अंगिरा
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अग्नि से भी ज्यादा तेज प्रखर रखते थे ऋषि अंगिरा
- वेदों के रचने का किया था काम
- प्रायोगिक शिक्षा में करते थे विश्वास
- देवगुरू ब्रहस्पति के पिता हैं अंगिरा
धर्मक्षेत्रे। नभ, पाताल या आकाश के साथ अन्य लोकों की खोज व उनमें जाना भले ही अभी मानव के लिए अभी पूरी तरह से सुगम न हो, पर हमारे पौराणिक ऋषियों के लिए यह बाएं हाथ का खेल था। उन्हें सटीक जानकारी थी कि आकाशगंगा में कौन सा ग्रह या तारा कहां पर स्थित है और उसकी पृथ्वी से दूरी कितनी है। हमारे पौराणिक ऋषि मन की गति से वहां पर जा सकते थे। उन्होंने ऐसे यंत्रों का निर्माण भी किया था दूसरे ग्रहों में रहने वाले लोगों की सहायता वह शीघ्र कर सकें। इतना ही नही उन्होंने अपने पुत्रों को भी दूसरे ग्रहों में रहने के निर्देश दिए ताकि उनसे तेज पाकर जाने वाले बालक वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा की पूर्ति कर सकें। आइये परमपिता ब्रहमा जी के द्वारा प्रथम मनवंतर में उत्पन्न किए गए ऋषि अंगिरा के उन कार्यों के बारे में जाने जिन्हें देखकर हम इस बात का गर्व महसूस कर सकें कि हमारे पूर्वज वास्तव में अपने तप के बल से कितने शक्तिशाली थे।
वेदों को रचने में सहयोगी ऋषि अंगिरा
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम।
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयुरू समलक्षणम॥ -मनु (1/13)
जिस परमात्मा ने आदि सृष्टि में मनुष्यों को उत्पन्न कर अग्नि आदि चारों ऋषियों के द्वारा चारों वेद ब्रह्मा को प्राप्त कराए उस ब्रह्मा ने अग्नि, वायु, आदित्य और (तु अर्थात) अंगिरा से ऋग, यजु, साम और अथर्ववेद का ग्रहण किया।
अंगिरा ऋषि कौन थे?
ब्रह्मा के मानस पुत्रों में से एक ब्रह्म ऋषि अंगिरा को वेदों के रचयिता चार ऋषियों में शामिल किया जाता है। माना जाता है कि अंगिरा से ही भृगु, अत्रि आदि ऋषियों ने ज्ञान प्राप्त किया। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी। अंगिरा ने धर्म और राज्य व्यवस्था पर बहुत काम किया। इनकी पत्नी दक्ष प्रजापति की पुत्री स्मृति (मतांतर से श्रद्धा) थीं जिनसे इनके वंश का विस्तार हुआ। अग्निदेव ने ही बृहस्पति के रूप में जन्म लिया था। बृहस्पति अंगिरा के पुत्र थे और वे देवताओं के गुरु के रूप में प्रसिद्ध हुए थे। उतथ्य तथा महर्षि संवर्त भी अंगिरा के पुत्र हैं। इन्होंने वेदों की ऋचाओं के साथ ही अपने नाम से अंगिरा स्मृति की रचना की।
अंगिरा ऋषि की तपस्या और उपासना इतनी तीव्र थी कि इनका तेज और प्रभाव अग्नि की अपेक्षा बहुत अधिक था। जल में रहकर तपस्या कर अग्निदेव ने जब देखा कि अंगिरा के तपोबल के सामने मेरी तपस्या और प्रतिष्ठा तुच्छ हो रही है तो वे दुरूखी हो अंगिरा के पास गए और कहने लगे- आप प्रथम अग्नि हैं, मैं आपके तेज की तुलना में अपेक्षाकृत न्यून होने से द्वितीय अग्नि हूं। मेरा तेज आपके सामने फीका पड़ गया है, अब मुझे कोई अग्नि नहीं कहेगा। तब महर्षि अंगिरा ने सम्मानपूर्वक उन्हें देवताओं को हवि पहुंचाने का कार्य सौंपा। साथ ही पुत्र रूप में अग्नि का वरण किया।
कहीं-कहीं ऐसी कथा भी आती है कि अंगिरा अग्नि के पुत्र हैं। यह बात कल्पभेद से ही बन सकती है। इनकी पत्नी दक्ष प्रजापति की पुत्री स्मृति थीं जिनसे अनेक पुत्र और कन्याएं उत्पन्न हुई। शिवपुराण में ऐसी कथा आती है कि युग-युग में भगवान् शिव व्यासावतार ग्रहण करते हैंय उनमें वाराहकल्प में वेदों के विभाजक, पुराणों के प्रदर्शक और ज्ञानमार्ग के उपदेष्टा अंगिरा भी व्यास थे। वाराहकल्प के नवें द्वापर में महादेव ने ऋषभ नाम से अवतार ग्रहण किया था। उस समय उनके पुत्ररूप में महर्षि अंगिरा थे। एक बार भगवान् श्रीकृष्ण ने व्याघ्रपाद ऋषि के आश्रम पर महर्षि अंगिरा से पाशुपतयोग की प्राप्ति के लिए बड़ी दुष्कर तपस्या की थी।
अंगिरा-स्मृति रू अंगिरा-स्मृति में सुन्दर उपदेश तथा धर्माचरण की शिक्षा व्याप्त है। अंगिरा स्मृति के अनुसार बिना कुशा के धर्मानुष्ठान, बिना जल स्पर्श के दान, संकल्प बिना माला के संख्याहीन जाप, ये सब निष्फल होते हैं।
ज्ञान देने का अतभुत तरीका
अंगिरा ऋषि का शिष्य उदयन बड़ा प्रतिभाशाली था। वह सदैव यही चाहता था कि पहले उसे ही प्रतिभा के प्रदर्शन का मौका मिले या लोग सिर्फ उसी का प्रदर्शन देखते रहें। इसलिए वह सहयोगियों से अलग अपना प्रभाव दिखाने का प्रयास करता था। अंगिरा ऋषि ने उदयन की इस वृत्ति को पहचानकर सोचा कि यह प्रशंसा पाने की लालसा है। प्रशंसा पाकर इसके भीतर अहंकार का जन्म होगा। यह वृत्ति इसे ले डूबेगी। अतः उसे समय रहते ही समझाना होगा।
सर्दी के दिन थे। अंगिरा ऋषि अपने शिष्यों के साथ सत्संग कर रहे थे। बीच में रखी अंगीठी में कोयले दहक रहे थे। अचानक वे बोले, ‘कैसी सुंदर अंगीठी दहक रही है। इसका श्रेय क्या अंगीठी में दहक रहे कोयलों का है?’ उदयन के साथ अन्य शिष्यों ने भी हामी भरी। फिर अंगिरा ऋषि ने एक बड़े चमकदार अंगारे की ओर इशारा करके कहा, ‘देखो, यह कोयला सबसे बड़ा और सबसे ज्यादा तेजस्वी है। इसे निकालकर मेरे पास रख दो। मैं बूढ़ा हूं, अतः ऐसे तेजस्वी अंगारे का लाभ निकट से लूंगा।’ उदयन ने एक चिमटे से पकड़कर वह अंगारा ऋषि के समीप रख दिया। फिर सब लोग पहले की तरह बातचीत करने लगे।
थोड़ी ही देर में वह अंगारा मुरझा गया। उस पर राख की परत जम गई। वह बुझा हुआ कोयला भर रह गया। इस पर अंगिरा ऋषि बोले, ‘शिष्यो, देखा तुमने? तुम चाहे जितने तेजस्वी हो, परंतु इस कोयले जैसी भूल मत कर बैठना। अंगीठी में वह अंत तक तेजस्वी बना रहता और सबके बाद तक गर्मी देता। लेकिन अब इसमें वह तेज नहीं रहा कि हम इसका कोई लाभ उठा सकें।’ उदयन के साथ-साथ दूसरे शिष्य भी समझ गए कि ऋषि परिवार की परंपरा वह अंगीठी है जिसमें प्रतिभाएं संयुक्त रूप से आगे बढ़ती हैं। व्यक्तिगत प्रतिभा का अहंकार न तो टिकता है और न ही फलित होता है।
संदीप रिछारिया

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