दिव्यता मे सर्वोपरि है अत्रि महराज

 

                                                                             


                                          जीवन सूत्र 

चंद्रमा मनसो जातः, चक्षो सूर्यो अजायतः,निर्विध्नं कुरू में देव सर्व कार्येशु सर्वदा।‘ वैदिक परंपरा में यह वह मंत्र है जिसे किसी भी कार्य को शुरू करने के पहले बोला जाता है। इस कार्यसिद्वि का आवाहन मंत्र भी कहते हैं। इसका सीधा भावार्थ है कि हमारा मन व बुद्वि चंद्रमा के समान शीतल रहे यानि दिमाग ठंडा रख और चमकती खुली आंखों से अगर हम कोई कार्य करेंगें तो सिद्वि यानि पूर्णता अवश्य प्राप्त होगी। अब सवाल उठता है कि कार्य की सिद्वि का सम्बंध सूर्य और चंद्र से क्यों, इसका सीधा अर्थ है कि जो चीज हमें सामने दिखाई देती है, उसे देखकर हमें ज्यादा अच्छी प्रकार से चीजों की समझ आती है।ज्योतिष में सूर्य व चंद्रमा मुख्य ग्रह हैं। इनका सीधा संबंध हमारे शरीर है। इस तथ्य को बताने का काम सर्वप्रथम चित्रकूट की धरती से हुआ। 



                  

                 


                                                   

                                  दिव्य महर्षि अत्रि महराज

श्रीराम चरित्र के प्रथम गायक महर्षि वाल्मीकि से जब श्रीराम ने चित्रकूट में निवास के लिए पूंछा तो सबसे पहला नाम उन्होंने अत्रि महराज का लिया। इस प्रसंग का श्रीराम चरित मानस में सीधा उल्लेख है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गोस्वामी जी ने ‘अत्रि आदि मुनिवर बहु बसहिं‘ का उल्लेख किया है। इसका सीधा अर्थ है कि त्रेता युग में महराज अत्रि श्रीचित्रकूटधाम के सबसे बड़े संत थे। आज हमारी कथा श्री ब्रहमा जी के नेत्रों से उत्पन्न महराज अत्रि को समर्पित होकर यह बताती है कि श्रीराम के आगमन के पूर्व चित्रकूट की महिमा कितनी पावन व अनुपम थी।  

----------------------------------------------------

                                                        


                                        आज भी दिव्य स्थल है अत्रि अनुसूइया आश्रम 

वैसे तो श्रीचित्रकूट परिक्षेत्र में स्थित अनुसुइया आश्रम आज भी आम जनमानस के लिए कल्पना लोक की तरह दिखाई देता है। मां मंदाकिनी के पवित्र जल में मिलने वाले दर्जनों श्रोतों, योगिनी, त्रण मोचन, पाप मोचन सहित आधा दर्जन से दिव्य शिलाओं के दिव्य दर्शनों के साथ ही नयाभिराम पर्वत व प्राकृतिक संुदरता के कारण यह स्थान लोागें के लिए अत्यधिक आकर्षण का केंद्र है। यहीं पर मां अनुसुइया के प्राचीन मंदिर के साथ ही दिव्य तपस्वी संत परमहंस जी द्वारा बनवाया गया विशाल आश्रम है। यहां की अवधूत ऋषि परंपरा का डिमडिमघोष मिर्जापुर से लेकर धारकुंडी तक होता है। आज के समय में बाहर से आने वाले श्रद्वालु चार धामों में प्रतिस्थापित अत्रि अनुसुइया आश्रम का दर्शन चित्रकूट आकर जरूर करते हैं। 

                                            



                           श्रीचित्रकूटधामः श्रीराम की मुख्य शिक्षा का केंद्र  

 - ऋग्वेद का आत्रेय मंडल करता है अत्रि महराज की व्याख्या 
- जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वही अत्रि 
- जिनके अंदर है सूर्य का ताप और चंद्रमा की शीतलता 


 सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के बारे में सभी जानते हैं पर इसकी खोज सर्वप्रथम किसने की उस पर सब मौन हो जाते हैं, आज हम आपको एक ऐसे ऋषि की कथा सुनायेंगे जिन्होंने सर्वप्रथम सूर्य व चंद्र ग्रहण की सटीक खोज कर मानवता की न केवल रक्षा की थी बल्कि लोगों को इसके दुष्प्रभावो से भी बचाने का काम किया था। इसका सीधा अर्थ यह है कि परमपिता ब्रहमा जी की आंखों से उत्पन्न पुत्र महासती अनुसुइया के पति त्रिदेवों के पिता व आयुर्वेद के मंत्र दृष्टा ऋषि आत्रेय के पिता महर्षि अत्रि को न केवल सूर्य ग्रहण व चंद्रग्रहण बल्कि सभी  प्रकार की ज्योतिष का पूर्ण ज्ञान था। वे भूतल के साथ ही सभी लोकों की यात्रा करने में भी पूरी तरह समर्थ थे। वैसे तो उनके चमत्कारों की श्रंखला लंबी है, पर यहां पर हम उनके एक ऐसे चमत्कार की चर्चा करेंगे जो अतभुद, अनोखा, अकल्पनीय है। 

  शिक्षा कभी सम्पूर्ण नही होती। इस बात का पता श्रीचित्रकूटधाम में आकर पता चलता है। श्रीराम को बचपन में प्रारंभिक शिक्षा महर्षि वशिष्ठ जी ने दी तो उससे उच्च शिक्षा के लिए महर्षि विश्वामित्र जी ने उन्हें अपने साथ रखा और जब उन्हें और उच्च शिक्षा की जरूरत हुई तो उन्हें चित्रकूट के गुरूकुल का आसरा लेना पड़ा। आज हम बात कर रहे हैं ऐसे गुरू की जिसने न केवल श्रीराम को शिक्षा दी बल्कि अपने ज्ञान को बांटने के लिए उसने सम्पूर्ण आर्यावत का चक्कर लगाया। 

श्रीराम से आगमन के पूर्व चित्रकूट तमाम ऋषियों के द्वारा सेवित था। इनमें एक थे अत्रि महराज। यह ब्रहमा जी के द्वितीय मानस पुत्र महासती अनुसुइया के पति थे। वैसे जब इनकी पत्नी महासती अनुसुइया के सतीत्व की परीक्षा लेने के लिए त्रिदेव धरती पर आए, तो माता के तपबल के कारण उन्हें बालक बनना पड़ा। हालात यहां तक हुए कि काफी समय बीत जाने के बाद भी जब तीनों देवियों को उनके पति नही मिले तो उन्हें माता अनुसुइया की शरण में आकर उन्हें सर्वोच्च महासती के रूप में स्वीकार करना पड़ा। 

वैसे ऋग्वेद का आग्नेय मंडल के साथ ही अत्रि संहिता व अत्रि स्मृति इस बात का पूर्ण समर्थन करते हैं कि वह कितने ज्ञानी और ध्यानी थे। वैसे इनकी कीर्ति श्री मद्भागवत, ब्रहम पुराण, मत्स्य पुराण, स्कंध पुराण आदि में वर्णित है। श्रीराम चरित्र का एक भी ऐसा ग्रंथ नही जहां पर इनकी मेघा व उल्लेख न किया गया हो। 

महाभारत के अनुदान पर्व के 93 वें श्लोक में महराज अत्रि अपने नाम की व्याख्या स्वयं करते हैं। कामादि शत्रुओं से त्राण करने वाले को अरात्रि कहते हैं और अत् ‘मृत्यु ‘ को बचाने वाला अत्रि कहलाता है। इस प्रकार से अरात्रि होने के कारण अत्रि हूं। जब तक जीव को एक मात्र परमात्मा का ज्ञान नही होता, तब तक अवस्था रात्रि की रहती है। अज्ञानावस्था से रहित होने के कारण भी मैं अत्रि हूं। सम्पूर्ण प्राणिक के अज्ञात होने के कारण जो रात्रि के समान है उस परमात्मा तत्व में मैं सदा जागृत रहता हूं। अतः वह मेरे लिए अरात्रि के समान है। इस व्युत्पत्ति के कारण भी अरात्रि व अत्रि नाम धारण करता हूं। यही मेरे नाम का तात्पर्य है। 

वैसे इसी पर्व में एक उपख्यान 156 वें श्लोक में भी  प्राप्त होता है। जो महराज अत्रि की महिमा का गुणगान करता है। प्राचीन काल में एक बार देव दानव घोर अंधकार में संग्रामरत थे। राहु ने अपने बाणों से सूर्य और चंद्रमा को घायल कर दिया था। अंधकार में फंसे देवता कुछ सूझ न पड़ने के कारण एक साथ बलवान राक्षसों के द्वारा मारे जा रहे थे। असुरों की मार से देवताओं की प्राणशक्ति क्षीण हो चली थी। वे भागकर तपोरत महर्षि अत्रि के पास पहुचे और उन्होंने उन क्रोध शून्य जितेन्द्रिय मुनि का दर्शन किया और कहा कि असुरों ने अपने बाणों द्वारा चंद्र और सूर्य को घायल कर दिया है और अब घोर अंधकार छाने के कारण हम सभी शत्रुओं के हाथों मारे जा रहे हैं। अब कृपा कर हमारी रक्षा कीजिए। अत्रि बोले देवताओं भला मैं आपकी रक्षा कैसे कर सकता हूं। देवता बोले आप अंधकार को नष्ट करने वाले चंद्रमा और सूर्य का रूप धारण कर लीजिए। सर्वप्रथम संसार को अंधकार से मुक्त करिए और फिर अपने तेज से शत्रु बने दानवों का नाश करिए। देवताओं के ऐसा कहने पर महर्षि ने चंद्रमा का रूप धारण किया। और सोम के समान प्रिय दिखने लगे फिर शांत भाव से देवताओं को देखा। उस समय चंद्रमा और सूर्य की प्रभा मंद देख अत्रि ने अपनी तपस्या से युद्व भूमि में प्रकाश फैलाया और सम्पूर्ण जगत को अंधकार शून्य कर आलोकित कर दिया साथ ही अपने प्रखर तेज से शत्रुओं को दग्ध कर दिया। अत्रि के तेज से परास्त हो रहे दावनों का हाल देखकर देवता उन पर टूट पड़े और देवताओं ने उनका विनाश कर दिया। महर्षि ने सूर्य को तेजोमय बनाकर देवताओं का ही नही वरन सम्पूर्ण सृष्टि का कल्याण किया। 

श्रीमद भागवत में उन्हे परमपिता ब्रहमा के समान तेजस्वी कहा गया है, एक ओर जहां उन्हें ब्रहमा जी ने अपने नेत्रों से प्रकट किया तो उन्होंने भी अपने नेत्रों से चंद्रमा को प्रकट किया। इन्हीं के तीनों पुत्र त्रिदेव अवतार हैं। भगवतावतार अवधूत भगवान दत्तात्रेय स्वयं श्रीहरि विष्णु, द्वितीय पुत्र शिवावतार महर्षि दुर्वासा तो तीसरे पुत्र ब्रहमा जी के सदृश चंद्रमा हैं। तमाम उपख्यान दत्तात्रेय महराज व दुर्वासा ऋषि की कथाओं से भरे पड़े हैं। 

 ------------------------------------



                       





Comments